I am a heart core journalist. Some time things make me to ponder on the issue, when people dont get his of her right of health. food and ofcourse of shelter. Coverning health since 8 years some things that can not reflect my passion of writing in print media. That i want to put on this platform. hope i will be successfull in delivering my things in simple manner.
Wednesday, 7 March 2018
aapni baat: वो लड़की
aapni baat: वो लड़की: वो लड़की कॉलेज की हर लड़की उससे दूर भागती थी, उसके साथ चलना तो दूर कोई साथ बैठना पसंद नहीं करता था, जहां लड़कियों के झुंड के बीच लाली ल...
वो लड़की
वो लड़की
कॉलेज की हर लड़की उससे दूर भागती थी, उसके साथ चलना तो दूर कोई साथ बैठना पसंद नहीं करता था, जहां लड़कियों के झुंड के बीच लाली लिपस्टिक और नए फैशन की बातें होती थी, उसके पास केवल अपने जीते हुए मेडल, हर्डल रेस और लांग रेस के किस्से होते थे। वह अब तक पढ़ी भी लड़को के बीच थी और यही कारण रहा कि पहनावे से भी वह खुद को लड़को जैसा ही रखती थी। प्रार्थना सभा शुरू होने से पहले ही वह लाइन में आकर खड़ी हो गई, उसे कॉलेज में प्रवेश लिए एक हफ्ते से अधिक हो गया था, लेकिन किसी ने उससे दोस्ती करने की हिम्मत नहीं की, हालांकि कानाफूंसी के जरिए उसके चर्चे हर जुबां तक पहुंच चुके थे।
देहरादून से दसवीं की परीक्षा पास कर उसने ग्याहवी में एडमिशन लिया था, कॉलेज क्या शहर ही नया था, दोस्त होना तो दूर की बात। उसने मन के भाव ने प्रिंसिपल ने पढ़ा और बोले, प्रतिमा क्या हुआ, कॉलेज अच्छा नहीं लगा, दोस्त नहीं बना अभी तक क्या कोई, बेहद कम और लगभग चुप रहने वाली उस लड़की की पहली बार क्लास में सबसे आवाज सुनी, नहीं, हमें कोई यहां पसंद नहीं करता, भारी भरकम आवाज और उतने ही रौबिले अंदाज में दिया गया जवाब, प्रिंसिपल के कहने पर दो लड़कियों को प्रतिमा से बात करने को कहा गया। कॉलेज से घर की दूरी लगभग बीस मिनट की थी, जिसे अकसर पैदल चल तक ही तय किया जाता था, जबकि प्रतिमा की मौसी का घर जहां रहकर वह पढ़ने आई थी, लगभग आधे घंटे की दूरी पर था, प्रिसिपल की डांट के बाद यकायत सब लड़कियां उसे कंपनी देने पहुंच गई, लेकिन सुषमा का घर रास्ते में ही पड़ता था, घर लौटते हुए सुषमा ने कहा कल जल्दी निकलना घर से चाय पीकर साथ कॉलेज जाएगें, मां भी मिलना चाहती है तुमसे मैने बताया मम्मी को तुम्हारे बारे में, तो आ रही हो न कल सुबह? हां आती हूं तैयार रहना जल्दी निकलना होगा, प्रतिमा ने कहा, कॉलेज से घर और घर से कॉलेज के बीच का साथ अब दोस्ती में बदल गया था, सुषमा के बहाने बाकी लड़कियां भी अब प्रतिमा से घुलने मिलने लगी थी, राज्य स्तरीय रेसिंग में मेडल हासिल करने के उसके किस्से फेमस होने लगे। इसी बीच प्रतिमा गल्र्स हॉस्टल के किस्से भी खूब सुनाती, लड़को जैसा उसका पहनावा और जीत के किस्सों से सुषमा के मन में प्रतिमा के लिए अलग सा आर्कषण पैदा होने लगा, कुछ ही दिन में छह फीट लंबी प्रतिमा और पांच फीट लंबी सुषमा की दोस्ती के किस्से पूरे कॉलेज में छा गए, अब तो उनकी दोस्ती की मिसालें दी जाने लगीं, एक टिफिन में खाना, साथ आने जाने, पढ़ाई करने से लेकर अधिकांश समय दोनों का एक दूसरे के साथ ही बीतता। कॉलेज खत्म होने के बाद प्रतिमा देहरादून वापस चली गई, लेकिन दूर होने से भी दोस्ती पर फर्क नहीं पड़ा, हर दो से तीन महीने में कभी सुषमा देहरादून तो कभी प्रतिमा कानपुर पहुंच जाती, परिजन निश्चिंत थे दोस्ती ही है और दोनो एक दूसरे का अच्छे से ख्याल रखती हैं। एक शाम सुषमा की मां ने उसे एक लड़की फोटो दिखाई, जिसे सुषमा ने नजरअंदाज कर दिया, मां दस दिन में पचास से अधिक लड़कों की फोटो दिखा चुकी थी, लेकिन सुषमा ने पलटकर एक में भी रूचि नहीं दिखाई, मां का मन ठिठका, और प्रतिमा के घर पर आने की पाबंदी लगा दी गई। दोस्ती का सिलसिला चिट्टी के जरिए जारी रहा, एमए करने के बाद सुषमा को दिल्ली में अच्छी नौकरी मिल गई, एक बार फिर उसे प्रतिमा से बेझिझक मिलने का मौका मिला और जुगाड़ लगाकर प्रतिमा भी दिल्ली पहुंच गई,मां को अंदेशा इसी बात का था। बेटी बड़ी हो गई है ज्यादा उलझना ठीक नहीं, यह सोचकर मां ने कुछ नहीं कहा, इसी बीच सुषमा के ऑफिस में एक लड़के ने उसे प्रपोज किया, सुषमा ने घर पहुंचते ही उसे यह बात प्रतिमा को बताई, सुषमा को प्रतिमा के ऐसे किसी भी रिएक्शन की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी, कॉलेज के समय की उसकी सबकी अच्छी दोस्त आज उसकी लाइफ के पहले ब्वाय फ्रेंड को गाली दे रही है, आखिर प्रतिमा इसकी पेजेसिव क्यूं हो रही है हमारी दोस्ती सहेलियो सी ही थी न, प्रतिमा ने क्या सपने बुन रखे है, बताया क्यूं नहीं, ऐसे तमाम सवाल सुषमा के मन में कौंध गए, प्रतिमा ने उसे हिदायत दी कि वह आइदा उस लड़के से नहीं मिलेगी, सुषमा को शक हुआ प्रतिमा का व्यवहार उसके प्रति ठीक नहीं है। दो से तीन महीने के अंदर दोनों में जबरदस्त लड़ाई होने लगी, इतनी कि प्रतिमा को घर छोड़ कर जाता पड़ा, सुषमा को कॉलेज के दिनों का पहला क्रश याद आया, उस समय भी उसने प्रतिमा को उसके बारे मे बताया था तो वह ऐसे ही गुस्सा हुई थी, वह समझ नहीं पाई प्रतिमा लड़को जैसी दिखती ही नहीं है बल्कि उसका व्यवहार भी लड़को जैसा ही है। सुषमा ने मां को फोन कर सारी बातें बताई, मां कुछ दिनों के लिए उसे घर बुलाया और तसल्ली से सारी बातें सुनीं, सुषमा के सामने अब तस्वीर साफ थी, उसने प्रतिमा से दूरी बनानी शुरू कर दी। आज प्रतिमा को सुषमा की जिंदगी से गए दस साल हो गए है, फेसबुक पर लड़को सी दिखने वाली एक लड़की की प्रोफाइल और उसकी दोस्त दिखी तो अचानक प्रतिमा की कहानी याद आ गई।
निशि भाट
Saturday, 27 January 2018
शुक्रिया एम्स, शुक्रिया दोस्त
पेशे से पत्रकार,
घुमने और पढने
का शौंक, यूं
तो यहां आना
एक इत्तेफाक था,
लेकिन यहां आएं
तो यहीं के
होकर रहे गए,
खबरों को चुनने
के लिए दिन
भर घुमना और
अगर पसंद की
मिल जाएं तो
उसको पकाने के
लिए जी जान
लगा देने का
तक का जुनून,
हेल्थ बीट देखते
देखते अस्पतालों से
चरम सीमा तक
का प्रेम हो
गया, अंदाजा इसी
बात से लगाया
जा सकता है
कि हर बड़े
अस्पताल का चिर
परिचित चेहरा हमें वहां
का मुलाजिम समझता
है। इसी घुमक्कड़ी
की आदत की
बदौलत जिंदगी ने
कुछ अजीज दोस्त
भी दिए।
एम्स के न्यूरोलॉजी
विभाग की ओपीडी
में रोजाना की
तरह भीड़ थी,
कमरा नंबर सात
के सामने एक
बेसुध सी महिला
कभी व्हील चेयर
पर गर्दन लटकाएं
अपने पति को
देखे रही थी
तो कभी डॉक्टर के
कमरें को, तंग
जगह और भीड़
के कारण रूपम
से ज्यादा देर
बात नहीं हो
पाई, कुछ देर
रूककर पूछा, कहां
से आई हो,
क्या परेशानी है?
एक सवाल ने
जैसे उसके मन
के अंदर की
पीड़ा को हवा
दे दी, झारखंड
निवासी रूपम के
पति के सिर
में ट्यूमर है,
बीते चार साल
से एम्स इलाज
कराने आ रही
है, सात और
दस साल के
दो बच्चों की
परवरिश के साथ
ही रूपम को
पति का इलाज
भी कराना है।
हर दो हफ्तें
रूपम डॉक्टर के
बताए समय पर
एम्स पहुंच जाती
है। बातों का
सिलसिला आगे बढ़ता
इतने में ही
नंबर आ गया,
पति को कुर्सी
से संभालती हुई
वह कमरे की
ओर बढ़ी, पीछे
मुड़कर कहा, सड़कपार
राजगढ़िया धर्मशाला में ठहरे
हैं, आइएगा मिलने,
रूमप की थोड़ी
लेकिन बेहद गंभीर
बातों ने उससे
दोबारा मिलने की वजह
पैदा कर दी,
दो दिन बाद
फिर एम्स जाना
हुआ, मैं राजगढ़िया
के गेट पर
खड़ी, एक पत्रकार
की हैसियत से
नहीं, एक समाजसेविका
के रूप में,
बहुत बार ऐसा
होता है कि
कुछ अच्छा करने
के लिए पत्रकार
सरीखी सही पहचान
बताने की जगह
सामान्य परिचय देने में
काम जल्दी बन
जाता है। रूपम
के पति को
कैंसरयुक्त सिर का
ट्यूमर था, जिसने
दिमाग को अधिकांश
हिस्सा घेर रखा
था, सर्जरी कर
ट्यूमर निकाला जा चुका
था, हर दो
हफ्ते में कीमो
के लिए उसे
झारखंड से एम्स
आना होता है।
रूपम इस संघर्ष
में अकेले ही
थी, बच्चों की
जरूरत पूरी करने
के लिए घरों
में काम भी
करती थी। लेकिन
बीते तीन साल
में उसके एम्स
आने के कार्यक्रम
में कभी कोई
बदलाव नहीं हुआ,
रूपम ने बताया
कि आठ चरण
की कीमों होनी
है, सेहत में
सुधार हो रहा
है तो दिल
को तसल्ली मिल
रही है। ओपीडी
में रूपम से
मुलाकात हुई, लेकिन
इसके बाद मिलने
का सिलसिला जारी
रहा, कुछ दिन
बाद जब इस
बात की तसल्ली
हो गई कि
पति पूरी तरह
ठीक है तब
रूपम का एम्स
आना कम हो
गया, पति की
सेहत में सुधार
के साथ ही
मैं रूपम में
एक अजीब तरह
का आत्मविश्वास देख
रही थी। दो
साल के अंतराज
के बाद मार्च
2017 में उसने फिर
फोन किया, तय
समय के अनुसार
अगले दिन मैं
राजगढ़िया के गेट
पर मिली, बताया
गया, लड़के ने
बीए पास कर
दिल्ली में ही
नौकरी शुरू कर
दी है, पति
सहित पूरा परिवार
अब यहीं रहेगा,
लड़की को बीए
की पढ़ाई के
लिए डीयू में
प्रवेश कराना है। बीते
पांच साल के
अपने दोस्ती का
सफर एक बारी
में मेरी आंखों
के सामने घुम
गया। दिल से
रूपम ने कहा
शुक्रिया एम्स, शुक्रिया दोस्त,
Sunday, 11 June 2017
And who will listen to Kashmir?
I have lots things to say about Kashmir, My perspective
would never have been change if I could not get chance to talk to localities,
student, taxi driver or the waiter of hotel. Though I am not biased but thing
are beyond what it has been displayed in the picture in term of Nationalism. It was three days trip organized by
Aiims. Every one is here want to talk to
you. Yes they are not happy. One of the
student of zoology say we are the generation born in conflict and will die in
conflict. Expectations increase double when you introduce yourself as a
journalist of a National news paper. My
journey Srinagar from Airport to laalchowk in down town was full of lots of
complaints of kashmires. We got chance to talk to some student of University
of Kashmir. I am starting with an incident. Ex director of Aiims Dr. M.C Mishra
just finished his lecture on trauma care injury,
Q AND A Pannel was open for student. One student of social work
department Ansur asked more over the time kasmires got injury of pallet gun
shot. In such case when if some one come forward to help them ARMY them and they summoned who has help them. This
was not the only one question that was remained unanswered another student also
asked about the patient who had lost their eye sight because of pallet gun
attack. This gave chance to check the pulse of student. Student of zoology Zarin
was also in same temperament. All were supporting word AZADI. One guy of tea stall said mental
illness is increasing in Kashmir, we are not getting proper employment and
education, guy named ahmed once went to delhi for his family’s bread and
butter, he was so many times harassed by police.. saying ek toh musalman uspe
se Kashmir se… he come back to Kashmir after four month and again started
selling kehwa. Student of new generations are united they are educating people
for their rights. They well know since long how diplomacy has been played on
the behalf of their problem. Kashmiris
event don’t have a single complain
against Pakistan. Don’t know why but it could be like if some one come forward
to help you in bad time so he become God for you. It is just like that when a
father start ignoring his own child and child used to become fond of neighbor.
Now that neighbor is every thing for him. And he even don’t want to hear a
single word about him. LOTS OF proof of this fact can be seen in down town
city. We were told a word YOU ARE SAFE
HERE IF YOU ARE NOT WITH CRPF, BSF OR ARMY. That single word was enough of say
lots of things. Tuesday, 21 February 2017
AND....HE DIED, WAITING FOR STENT
स्टेंट के इंतजार में दिलशाद की हुई मौत- छह स्टेंट के खर्च का पैसा नहीं जुटा पाए
- यूपी सरकार से मिली थी 75 हजार की आर्थिक सहायता
बीते छह महीने से दिल में स्टेंट डालने का इंतजार कर रहे दिलशाद की शनिवार दोपहर मौत हो गई। धमनियों में अधिक रूकावट को देखते हुए जीबी पंत अस्पताल ने उसे छह स्टेंट की जरूरत बताई थी, जिसपर अनुमानित खर्च एक लाख 41 हजार रुपए बताया गया। रुपए जुटाने में अक्षम दिलशाद ने यूपी सरकार से मदद मांगी। लेकिन सरकार ने केवल तीन स्टेंट का ही पैसा दिया, जिसे लगाने के लिए वह छह महीने से जीबी पंत के चक्कर काट रहे थे।
रामुपर निवासी 56 वर्षीय दिलशाद शुक्रवार को जीबी पंत अस्पताल में ही थे, चलने में बेहद अक्षम उनकी पत्नी ही उन्हें पकड़ कर चल रही थी। पूछने पर पता चला कि दिल में बहुत दर्द है लेकिन यहां इलाज नहीं हो पा रहा। दरअसल दिलशाद अपनी बीमारी के लिए जरूरी कीमत का पैसा नहीं जुटा पा रहे थे। दिसंबर महीने में मशक्क्त कर उसने यूपी सरकार से 75 हजार रुपए की धनराशि स्वीकृत भी करा ली, दिसंबर महीने में ही यह धनराशि अस्पताल के खाते में भी आ गई, बावजूद के फरवरी महीने तक भी दिलशाद की एंजियोप्लास्टी नहीं हो पाई। चिकित्सक छह की जरूरत पर तीन न लगाने का जोखिम नहीं उठा पाए और दिलशाद की मौत हो गई। जीबी पंत के एमडीआर रूम से मिली जानकारी के मरीज को एक प्रार्थना पत्र लिखना था, जिसके बाद उसकी सहमति से छह की जगह तीन स्टेंट लगाए जाते। दिलशाद की पत्नी ने बताया कि उन्हें किसी ने भी प्रार्थना पत्र लिखने की बात नहीं बताई। शुक्रवार को भी चिट्ठी लिखने के बाद दिलशाद को दस दिन के बाद की तारीख दी गई। इस बार वह इनता लंबा इंतजार नहीं कर सका और शनिवार को रामपुर में दिलशाद ने दम तोड़ दिया।
सरकार ने कम धनराशि स्वीकृत की
दिलशाद का इलाज करने वाले जीबी पंत अस्पताल के हृदयरोग विभाग के प्रमुख डॉ. विजय कुमार त्रेहन ने बताया कि जिस मरीज को छह स्टेंट की जरूरत उसे तीन लगाकर छोड़ देना सही नहीं, यूपी सरकार को यदि मरीज की मदद करने ही थी तो उसे जरूरत के अनुसार धनराशि स्वीकृत की जानी चाहिए थी। बावजूद इसके दिलशाद की मौत होना बेहद दुखद है।
मामले की जानकारी नहीं
ऐसे किसी मामले की जानकारी नहीं है, रिकार्ड जांच कर पूरी जानकारी हासिल की जाएगी, मरीज के इलाज में यदि बेवजह की तारीख दी गई तो अन्य पहलू भी जांचें जाएगें।
डॉ. राजीव चावला, निदेशक, जीबी पंत अस्पताल
हर महीने होती है एक हजार एंजियोप्लास्टी
दिल्ली सरकार के प्रमुख सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में हर महीने एक हजार मरीजों की एंजियोप्लास्टी की जाती है। पिछले साल अस्पताल के स्टॉक में 7200 स्टेंट की आपूर्ति की गई।
Friday, 3 October 2014
General ward
एम्स की ओपीडी की भीड़ में हर इंसान के चेहरे की अलग कहानी है. कहना चाहे तोह एक लाइन में बाय हो जाये की सब बीमारी का इलाज करने आते है जबकि पढ़ा जाये तो हर चेहरे की अलग कहानी है, कुछ मायूस से कुछ परेशान तो कुछ अपनी ही किस्मत का रोना रोते मरीज सही भी है देश में बीमार होना किस्मत ख़राब होने जैसा ही है.जो एम्स जैसे सरकारी संस्थान में भी इलाज कराने के लिए अपना घर और जमीन बेचकर आते है, खैर काम के सिलसिले अक्सर एम्स जाना होता है, इसलिए काम ही नहीं यहाँ लोगो का दर्द देखकर भी अपनी परेशानिया रत्ती भर नहीं लगती, पिछले हफ्ते एक स्टोरी के लिए यहाँ की राजगरिया धर्मशाला में जाना हुआ, यह जगह भी अपने आप में एक अलग कहानी कहती है, दूसरे राज्यों से यहाँ इलाज के लिए आने वाले दूसरे से इस कदर नाता जुड जाता है की सगे भी क्या मदद करेँगे, इसी वार्ड में बीते कई महीने से ३२ वर्षीय लक्ष्मी रह रही है, दिल का वाल्व ख़राब है ऑपरेशन की तारीख २० महीने बाद की मिली है, संस्कृत से बीए पास लक्ष्मी को उसका पति छोड़ गया है बिहार में तीन साल के बेटे को छोड कर खुद अपना इलाज करने एम्स में है. सर्जरी में आने वाले खर्च का जुगाड़ करने के लिए बार बार स्वास्थय मंत्रालय जाना पड़ता है, कई बार रास्ते में साँस फूल जाती है लेकिन कोई साथ देने वाला नहीं, बीमार पत्नी को पति साथ नहीं रखना चाहता, और ससुराल वाले इलाज नहीं करना चाहते, पैसे का बंदोबस्त हो पाये तोह शायद लक्ष्मी बच जाये लेकिन ससुराल या मायके उसके साथ नहीं, यहाँ यह पूरी कहानी कहने का मकसद लक्ष्मी का दर्द बताना नहीं है बल्कि यह कहना है कि. पढ़ी लिखी लडकिया आखिर समय के आगे ऐसे कैसे झुक सकती है, लक्ष्मी जैसे औरतो और लड़कियों को देखकर तरस आता है, अपनी किस्मत खुद बनाये बिना जिंदगी में सम्मान हासिल नहीं हो सकता, जिसकी कोशिश खुद लड़कियों को ही करनी होगी, एक जाने माने डॉक्टर का नंबर देकर लक्ष्मी के इलाज का तोह बंदोबस्त कर दिया, ज़िन्दगी से हार चुकी लक्ष्मी के चेहरे पर जीने की कुछ चमक दिखाई दी, सुकून तोह मिला लेकिन मन बार बार ये सोचता रहा की उसके पढ़ने फायदा जो अपने लिए एक अदद प्राइवेट नौकरी न कर सके, जिससे वह अपने और परिवार के बीच सम्मान से तोह जी सकती थी, वह हार गई थी या फिर शादी को ही उसने किस्मत का फैसला मन लिया, लक्ष्मी का इलाज करने में धर्मशाला की ही एक महिला गार्ड ने मदद की है वह ठीक हो जाएगी, शायद अपने पैरो पर खड़े होने की हिम्मत भी जुटा सके,
Saturday, 15 February 2014
challenge to sustain
कोलकाता की ऐतिहासिक ट्राम की रफ्तार अब मदम पड़ गई है, जो सघन यातायात के बीच ही यदा कदा दिख जाती है। इसके रखरखाव पर सरकार ज्यादा ध्यान नहीं देती। कई बार तो इसके देखने मात्र के लिए सियालदाह के पास बने ट्राम स्टेशन तक जाना पड़ता है। साल्ट लेक सिटी से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित हावड़ा के रास्ते में शहर की असली तस्वीर देखती है। हावड़ा ब्रिज के झिलाऊ ट्रैफिक जाम को हुगली ब्रिज ने काफी हद तक कम कर दिया है। दो से तीन घंटे का हैवी ट्रैफिक जाम झेलने का समय होने पर ही अब हावड़ा ब्रिज से होकर जाने का साहस किया जाता है। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने लंबे समय तक शासन किया, लेकिन राज्य की समस्या जस की तस है, हाइवे की जर्जर रास्ते और अधूरा निर्माण कार्य इस बात की गवाही दे रहे थे। इंडी स्मार्ट होटल से निकलने वक्त हमे बिहार के मधुबनी जिले के ड्राइवर शकील का साथ मिला, जो हिंदी और बंगला दोनों जानता था, एक पल को ऐसा लगा जैसे मन की मुराद पूरी हो गई है, शॉपिंग (गढ़िया घाट) और घुमने की औपचारिक बातों के बाद सिलसिला राजनीति का शुरू हुआ। बीते 12 साल से बंगाल में रहे रहे शकील को राज्य के लोगों की परेशानी की जैसे एक-एक नब्ज पता थी, छोटे उद्योगों का पलायन, नई कंपनियों का निवेश न होना और सरकार की टैक्स नीति के चलते बंगाली मानुष का मन अब टीएमके की ममता बनर्जी सरकार से उठ गया है। यही कारण था कि एक दिन पहले सुभाष पार्क में हुई मोदी की रैली में लोगों ने जमकर हिस्सा लिया, पता चला मोदी को यहां भी लोग हसरत भरी निगाहों से देखते हैं। हमारे साथ मौजूद यूनिसेफ की सोशियल पॉलिसी स्पेशलिस्ट स्वाति पंडित डे भी इस बात की सहमति दी कि ममता के शासन में तानाशाही बढ़ी लेकिन रोजगार नहीं बढ़े। हुगली ब्रिज के दो टोल पार कर हम रानीहाती पहुंचे, जहां से 20 किलोमीटर दूर हमें शाहपाड़ा गांव जाना था। कच्ची सड़क के बीच जगह-जगह बने पोखर दिख रहे थे, पता चला 70 हजार लोगों की आबादी वाले इस ब्लॉक में पांच हजार पोखर हैं। हमारे बिहारी ड्राइवर ने बताया कि पोखर बनाने के लिए लोग मिट्टी फ्री में देने को तैयार हो जाते हैं, पोखर प्रेम को नजदीक से समझने पर पता चला कि घर के बाहर बना यही पोखर नहाने, कपड़े धोने और पानी की अन्य दैनिक दिनचर्या पूरी करने के काम आता है। घर के हाते में बने पोखर में मछली पालना और उससे आजीविका चलाना अधिकांश लोगों का मुख्य साधन है। हालांकि कुछ समुदाय के लोगों ने मछली सुखाकर उसे बेचना शुरू किया है। प्रयास अच्छा था, पोखर की यही व्यवस्था पोलियो अभियान के लिए चुनौती बनी। पता यूनिसेफ के पश्चिम बंगाल के अधिकारी नासिर अतीक ने पोखर पर एक शोध भी किया है। खुले शौच समस्या तो यहां अब भी मौजूद हैं, पांचला ब्लाक में पोलियो का अखिरी केस दिखा, लेकिन यहां गांव के लोग अब भी पोलियो पर विश्वास नहीं करते। रूखसार के पिता अब्दुल प्रति पोलियो दिवस पर 200 रुपए लेते हैं। नानी बातों बातों में कहती है अब कोई पैसा देगा तब ही रूखसार इंटरव्यूह देगी। यहां जरूरत पैसे की है, कोई बीमारी जाएं या रहे इससे इन्हें कोई मतलब नहीं, इसी गांव के एक दम्पति ने अपनी चार वर्षीय को हिना को कभी एक भी पोलियो ड्राप नहीं दी। पता चला कि वह पैसे के बदले ही ड्राप देने को राजी होगें, ऐसी स्थिति में शबाना और कनीज जैसी पोलियो कार्यकत्रियों का काम और भी अहम हो जाता है। कच्चे रास्ते से गुजरते हुए नजर आईसीडीएस केन्द्र पर पड़ी, अंडा, दाल और खीर लेते बच्चे तो दिखे, लेकिन कंधे पर बस्ता नदारद था।
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